गतिशील और मंथनशील भारत : नए साक्ष्‍य

ऐतिहासिक रूप से कार्य और शिक्षा के लिए लोगों का प्रवसन अर्थव्‍यवस्‍थाओं के संरचनात्‍मक बदलावों के साथ होता आया है। भारत की तुलना चीन से कैसे की जा सकती है (जिसमें आश्‍चर्यजनक रूप से कुल 277 मिलियन प्रवासी कामगार हैं)?  जनगणना के स्‍पष्‍ट अध्‍ययन पर आधारित परंपरागत दृष्टिकोण के अनुसार प्रवासियों की संख्‍या कम है (लगभग 33 मिलियन), और तेजी से नहीं बढ़ रही है। यह अध्‍याय नए आंकड़ों के स्रोतों का विश्‍लेषण करते हुए और / या नई कार्यपद्धतियों को उपयोग में लाते हुए भारत में श्रमिकों के प्रवसन के बारे में नए अनुमान उपलब्‍ध कराता है। आंकड़ों का स्रोत 2011 की जनगणना और रेल मंत्रालय के रेल सवारी यातायात का प्रवाह है।

पहला, भारत तेजी से बढ़ रहा है – और भारतीय भी। नया समूह आधारित प्रवास संख्‍या (सी एम एम) ये दर्शाता है कि अंतरराज्‍य श्रम गतिशीलता वर्ष 2001 और 2011 के बीच 5-6.5 मिलियन आबादी का औसत है, जिसमें लगभग 60 मिलियन की अंतरराज्‍य प्रवसन आबादी का प्रतिफल है और अंतर-जिला प्रवसन 80 मिलियन आबादी जितना अधिक है। आंतरिक कार्य से संबंधित प्रवसन का अब तक का पहला अनुमान, जिसमें वर्ष 2011-16 की अवधि के दौरान रेलवे के डाटा का उपयोग किया गया, यह दर्शाता है कि राज्‍यों के बीच वार्षिक औसत प्रवाह लगभग 9 मिलियन आबादी रही है। ये दोनों अनुमान लगभग 4 मिलियन आबादी के वार्षिक औसत प्रवाह के मुकाबले महत्‍वपूर्ण रूप से अधिक हैं, जैसा कि क्रमिक जनगणना में सुझाया गया है और यह पूर्व में किसी भी अध्‍ययन के अनुमानों से अधिक है।

 

चित्र -1 रेलवे यातायात डाटा पर आधारित प्रवसन प्रवाह का वार्षिक अनुमान

दूसरा, प्रवसन में बढ़ोतरी हो रही है। वर्ष 2001-2011 की अवधि के दौरान, श्रमिक प्रवासियों की वार्षिक दर पूर्व दशक के मुकाबले लगभग दुगनी बढ़कर  4.5 प्रतिशत हो गई। दिलचस्‍प बात यह है कि प्रवसन में तेजी महिलाओं के संदर्भ में स्‍पष्‍ट रूप से परिलक्षित हुई है, जो कि 2000 के दशक में पुरुष प्रवासियों की दर से लगभग दो गुना बढ़ गई है। अंतरराज्‍य प्रवासियों की संख्‍या भी दोगुना बढ़ी है और यह 20-29 साल पुराने कोहर्ट में लगभग 12 मिलियन रही है। प्रवसन में इस तेजी का एक विश्‍वसनीय अनुमान यह है कि इनाम (संभावित आमदनी और रोजगार के अवसर के रूप में) लागत और प्रवसन के जोखिमों से अधिक है। उच्‍च वृद्धि और आर्थिक अवसरों की बहुलता संभवत: प्रवसन में आई इस तेजी के लिए उत्‍प्रेरक है।

तीसरा, और संभवत: सबसे उत्‍साहजनक निष्‍कर्ष, जिसके लिए हमारे पास कोई ठोस प्रमाण नहीं हैं, वो ये है कि राजनीतिक सीमाएं लोगों की आवाजाही में बाधक होती हैं, जबकि भाषा लोगों की आवाजा‍ही में बाधक नहीं प्रतीत होती। उदाहरण के तौर पर ग्रेवे‍टी मॉडल दर्शाता है कि राजनीतिक सीमाएं लोगों की आवाजाही को हतोत्‍साहित करती हैं और यह बात इस तथ्‍य से जाहिर होती है कि राज्‍य के भीतर श्रम करने वालों की आवाजाही एक राज्‍य से दूसरे राज्‍य में होने वाली आवाजाही की तुलना में चार गुना है। हालांकि हिंदी को सामान्‍य भाषा के रूप में साझा नहीं करना यह दर्शाता है कि राज्‍यों के बीच वस्‍तुओं और व्‍यक्तियों की आवाजाही उतना वैमनस्‍य उत्‍पन्‍न नहीं करती।

चौथा, इस अध्‍ययन में लोगों की आवाजाही का पैट्रन आशा के अनुरूप एक समान रहा है– कम समृद्ध राज्‍यों से ज्‍यादा तादाद में लोग बाहर जाते हैं, जबकि ज्‍यादा समृ‍द्ध राज्‍यों में आने वाले प्रवासियों की संख्‍या सबसे अधिक होती है। चित्र – 2 राज्‍य स्‍तर पर सी एम एम स्‍कोर और प्रति व्‍यक्ति आय के बीच सकारात्‍मक संबंधों को दर्शाता है। बिहार और उत्‍तरप्रदेश जैसे अपेक्षाकृत कम समृद्ध राज्‍यों से बाहर जाने वाले लोगों की तादाद अधिक है। सात राज्‍य सकारात्‍मक सी एम एम मूल्‍यों को प्रवसन में परिलक्षित करते हैं : गोवा, दिल्‍ली, महाराष्‍ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक।

पांचवां, प्रवासियों की आवाजाही की लागत वस्‍तुओं की आवाजाही के लिए चुकता की जाने वाली लागत से लगभग दोगुना होती है – ये लोकप्रिय अवधारणा की एक और पुष्टि है।

चित्र – 2, समूह आधारित प्रवास संख्या बनाम राज्यों में वास्तविक आमदनी

प्रवसन के लाभ बरकरार रखने और उन्‍हें अधिकतम करने के लिए नीतिगत कार्रवाई में शामिल है : खाद्य सुरक्षा लाभ, स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी लाभ और मूलभूत सामाजिक सुरक्षा ढांचा- अंतरराज्‍य पंजीकरण प्रक्रिया के माध्‍यम से सुनिश्चित करना। जहां एक ओर प्रवासियों के कल्‍याण के लिए वर्तमान में विविध योजनाएं मौजूद हैं, जो राज्‍य स्‍तर पर लागू की जाती हैं, इसलिए उनके वास्‍ते व्‍यापक अंतरराज्‍य समन्‍वय की आवश्‍यकता है।

बेशक, ये सभी उत्‍साहजनक निष्‍कर्ष आपको उलझा देंगे कि अतिशय आंतरिक एकीकरण क्‍यों अब तक राज्‍यों में आय संबंधी अंतर को कम नहीं कर सका है। जैसाकि अध्‍याय – 10 में कहा गया है : भिन्‍न आम‍दनियों और खपत के साथ-साथ वस्‍तुओं, लोगों और पूंजी के आंतरिक एकीकरण की समान ताकतों का सह-‍अस्तित्‍व है, यह एक ऐसा रहस्‍य है, जिसका अर्थ समझना बाकी है।

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