पोर्न वीडियो अपलोड होने से नहीं रोक सकते: इंटरनेट प्रोवाइडर कंपनियां

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को गूगल जैसी इंटरनेट प्रवाइडर कंपनियों से पूछा कि अश्लील वीडियो अपलोड करने वाले लोगों की पहचान करने के लिए आखिर आपके पास क्या तंत्र है। कंपनियों की ओर से यह कहे जाने पर कि इस तरह के विडियो पोस्ट किए जाने पर पूरी तरह रोक नहीं लगाई जा सकती, लेकिन नियंत्रित जरूर किया जा सकता है। कंपनियों के इस तर्क को शीर्ष अदालत ने प्रथम दृष्ट्या खारिज करते हुए कहा, ‘हम इस पर रोक चाहते हैं, सिर्फ नियंत्रण नहीं।’

जस्टिस एम.बी. लोकुर और यूयू ललित की बेंच ने इस तरह के विडियोज से महिलाओं की प्रतिष्ठा और निजता के हनन का सवाल उठाते हुए गूगल की ओर से पेश हुए वकील से पूछा कि क्या आपके पास ऐसा कोई मेकेनिज्म है, जिससे ऐसे विडियोज अपलोड करने से पहले संबंधित व्यक्ति की पहचान उजागर हो सके।

गूगल का पक्ष रखते हुए सीनियर एडवोकेट सजन पूवय्या ने कहा, ‘इंटरनेट सर्विस प्रवाइडर के तौर पर गूगल अपनी ओर से होस्ट किए गए कॉन्टेंट को ‘कैटलॉग्ड’ कर सकता है। अश्लील कॉन्टेंट के बारे में जानकारी मिलने के बाद उसे ऑफ किया जा सकता है।

वकील ने कहा, ‘गूगल जैसे सर्च इंजनों पर हर घंटे बड़े पैमाने पर वेबसाइट्स की ओर से विडियोज अपलोड किए जाते हैं। ऐसे में सर्च इंजन के लिए इन्हें अपलोड किए जाने से पहले ही उसकी पड़ताल करने और उन्हें ब्लॉक मुश्किल है।’ वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि केंद्र सरकार की नोडल एजेंसी इस बारे में इंटरनेट सर्विस प्रवाइडर कंपनियों की मदद कर सकती है, जिससे आपत्तिजनक कॉन्टेंट को ऑफ किया जा सके।                        एजेंसी

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